जिला ब्यूरों: चंचलेश इन्दौरकर
बिछुआ/छिंदवाड़ा। डिजिटल इंडिया और आधुनिकता के दौर में जनपद पंचायत बिछुआ के अंतर्गत ग्राम पंचायत चकारा का ग्राम तोरणी आज भी आदिम युग जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। आदिवासी मवासी समाज बहुल इस गांव के लोग दशकों बाद भी जीवन की मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सरकारी योजनाओं की फाइलें तो आगे बढ़ती हैं, लेकिन इस गांव की पथरीली और कीचड़ भरी राहों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है।
शिक्षा और स्वास्थ्य का बुरा हाल
लगभग 500 की आबादी वाले इस गांव में शिक्षा का स्तर चिंताजनक है। यहाँ मात्र 50% पुरुष और 20% महिलाएं ही शिक्षित हैं। गांव में न तो ढंग का आंगनवाड़ी भवन है और न ही माध्यमिक स्तर तक की सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति तो और भी भयावह है; गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है। गंभीर बीमारी या इमरजेंसी की स्थिति में ग्रामीणों को मजबूरी में रामाकोना, नागपुर या छिंदवाड़ा के निजी अस्पतालों की दौड़ लगानी पड़ती है।
दो महीने तक ‘टापू’ बन जाता है गांव
ग्रामीणों ने बताया कि मुख्य सड़कें भले ही पक्की हों, लेकिन गांव की अंदरूनी गलियां आज भी कच्ची हैं। बरसात के मौसम में तोरणी गांव दो महीने तक बाढ़ के पानी से घिर जाता है और चारों ओर से संपर्क कट जाता है। कीचड़ और गंदगी के बीच लोग घरों में कैद होने को मजबूर हैं।
स्वच्छता अभियान बेअसर: गंदगी और मच्छरों का साम्राज्य
प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का इस पंचायत में कोई असर नहीं दिख रहा है।
- शौचालय का अभाव: मात्र 20% घरों में शौचालय हैं, जबकि 80% आबादी आज भी खुले में शौच के लिए विवश है।
- बजबजाती नालियां: नालियां कचरे से पटी पड़ी हैं, जिससे गंदा पानी सड़कों पर फैल रहा है। मच्छरों और बदबू के कारण गांव में संक्रामक बीमारियां फैलने का डर बना हुआ है।
- पेयजल संकट: सार्वजनिक प्याऊ न होने के कारण ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए लालायित हैं।
“सिर्फ वोट मांगने आते हैं नेता”
गांव के बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं में जनप्रतिनिधियों के प्रति गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि:
“चुनाव के समय बड़े-बड़े नेता और जनप्रतिनिधि सिर्फ वोट मांगने आते हैं। झूठे आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही कोई सुध लेने नहीं आता। न खेल मैदान है, न रोजगार की व्यवस्था और न ही किसानों के लिए सिंचाई के साधन।”
प्रमुख मांगें:
ग्रामीणों ने प्रशासन से पेयजल आपूर्ति, आंगनवाड़ी व स्कूल भवन का निर्माण, पक्की सड़कों का जाल, नियमित बिजली और सिंचाई व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस उपेक्षित गांव की सुध लेते हैं या तोरणी के आदिवासी परिवार यूँ ही विकास की टकटकी लगाए रहेंगे।
